Monday, 5 October 2020

 " ज़माने को कहाँ फिक्र है"

जीवन एक सफर है मुस्कराते चले जाओ।
कौन कब छूटा ये रास्तो को कहा फिक्र है।
कौन मिला उससे साथ निभाते चलो।
काफिला कहा कहा लुटा ज़माने को कहा फिक्र है।।
अफसोस उनका मत करो जो चल नही सके मंजिलो की और।
मंजिलो तक पहुचने वालो को छूटने वालो की कहाँ फिक्र है।।
छत्ते तोड़ने वाले तेरा शहद निकालते जायेंगे।
पर मधु बंनाने वाली मधुमक्खियों को शहद कब लुटा इसकी कहाँ फिक्र है।
कोयल का रंग काला है ये अक्सर लोग देखते है।
पर कोयल तो कूकती रहती है उसे अपने रंग की कहाँ फिक्र है।।
गजराज स्वागत करने वालो और भौकने वालो के लिये कहा रुकता।
वो अपनी मस्ती में चलता रहता उसे इन सबकी कहाँ फिक्र है।।
नदिया नीर बहा कर शोर मचाती फिर समुंदर में मिलती जाती।
पर सागर शांत रहता कितना नीर उसमे मिल गया इसकी उसको कहाँ फिक्र है।।
बसंत ऋतु आई फिर से चारो और फाग की खुशिया छाई।
नये पत्ते कितने लगे कितने गिर गये।इसकी गिनती की बसंत को कहाँ फिक्र है।।
इसलिये नया पल का करो स्वागत हर पल जीवन में ।
जो रोते चले गये जीवन मे उनकी भी ज़माना करता कहां फिक्र है।।
मनोज शर्मा "मन"

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