"इतना भी मत "
इतना भी मत आधुनिक बन जाना तुम
कि दिया बाती अंधविश्वास सा लगे।।
इतना भी मत आधुनिक बन जाना तुम
घण्टियों की आवाज़ शोर लगने लगे।।
इतना भी मत आधुनिक बन जाना तुम
गीता रामायण वेद सिर्फ पुस्तके लगने लगे।।
इतना भी मत आधुनिक बन जाना तुम
माता पिता परिवार बोझ लगने लगे।।
इतना भी मत आधुनिक बन जाना तुम
माँ की लोरिया गीत लगने लगे।।
इतना भी मत आधुनिक बन जाना तुम
मित्रता अब स्वार्थ पूर्ति लगने लगे।।
इतना भी मत आधुनिक बन जाना तुम
कि मेरा अस्तित्व ही तुम्हे न लगने लगे।।
जब सभी सीमाये लांघ जाओगे तुम
तब फिर प्रकृति तुम्हे मेरा अहसास करायेगी।।
दौड़ते दम्भी आधुनिक मानव तुम को।
सब कुछ होते हुए भी घरों में कैद कर जायेगी।।
सब अर्थ , काम , सम्पत्ति कुछ काम न आयेगा।
सिर्फ वो ही रह जायेगा जो मेरा नाम गुन गुनायेगा।।
मनोज शर्मा "मन"
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