Sunday, 18 October 2020

 हर्बल दवाइयों वाली भाभी

शर्मा जी के मित्र है रमेश जी। उनका फोन आया कि उन्हें कोरोना पोसिटिव हो गया है तथा श्रीमती जी को भी हो गया है। वो तो ठीक ठाक है पर श्रीमती जी का निमोनिया बिगड़ गया है।तो उन्हें गैलेक्सी नर्सिंग होम में दाखिल कराया है। कुछ दिन पहले उनके पार्टनर सुरेश को भी कोरोना पॉजिटिव होने पर इसी नर्सिंग होम में दाखिल कराया था। तो वो ठीक हो गये थे। और यहां इलाज बजट में भी रहा।
पर शर्मा जी हैरान थे क्योंकि करीब दस वर्ष पहले शर्मा जी का इनके घर जाना हुआ था। तो चूंकि रमेश जी नहा रहे थे। तो भाभीजी चाय लेक्ट आई थी। और बाते शुरू हो गई। शर्मा जी का वजन तब ज्यादा बढ़ा हुआ था। तो भाभी जी ने बताया कि आप हर्बल दवाइयां ले जिससे आपका स्वास्थ्य सही रहेगा। एक मशीन से उन्होंने चेक भी किया तो वो मशीन शर्मा जी की उम्र 57 बता रही थी। तब भाभीजी ने बताया कि आपकीं असली उम्र और शरीर की उम्र अलग अलग हो सकती है। जैसे कोई गाड़ी कमर्शियल चल रही है या घरेलू। ऐसे ही आप ध्यान, अपनी नींद, भोजन, प्रोटीन, विटामिन, व्यायाम डॉक्टरी सलाह समय समय पर ले रहे है कि नही ये इस पर निर्भर करता है।
तो उन्होंने शर्मा जी को कुछ सलाह भी दी कुछ दवाइयां और पीने के लिये हर्बल चाय भी। कुछ महंगी थी। शर्मा जी ने अपनी श्रीमती को वो चाय दी कि कल से ये पीयेंगे। फिर कुछ दिनों बाद फोन आया कि दवाइयों का असर कैसा हो रहा है शर्मा जी ने अच्छा बताया। उन्होंने और दवाइयां भेज दी। पर शर्मा जी का खानपान और व्यायाम नियमित न होने की वजह से उन दवाइयों का कोई असर नही हो रहा था। और दवाइयों का खर्चा फालतू लग रहा था।
उसके बाद भाभी जी का कई बार फोन आया । शर्मा जी ने ध्यान ही नही दिया। फिर फोन आने बंद हो गए। आज शर्मा जी को सुनकर आश्चर्य हुआ कि ये भाभी जी जो अपना काफी ध्यान रखती है। हर्बल दवाइया भी लेती है। आज वो सीरियस कंडीशन में है। और रमेश जी ने बताया अभी दस दिन बाद बिटिया की शादी भी है। सारी तैयारियां धरी की धरी रह गई। घर की हेड आपको पता है पत्नी होती है हमे तो ये भी नही पता कि तौलिया कहां रखा है कच्छे बनियान मांगने पड़ते है। अब सब गीत , मेहमान, सगुन, कार्ड सब धरा ही रह गया है। खुशियां समाप्त हो गई है । शर्मा जी एक दम जड़ हो गये। की सही बात है माँ ही बीमार हो जाये तो आरता कौन करेगा। मेहमानों को कौन संभालेगा। कपड़ो की खरीदारी। और बीमारी भी ऐसी जिसमे उनसे मिला भी नही जा सकता न घर मे रखा जा सकता है। शर्मा जी की और रमेश जी की बाते चली जा रही थी।
फिर शर्मा जी ने पूछा फिर अब कैसे होगा। उन्होंने बताया लड़के वाले बहुत ही अच्छे है अब शादी वाले दिन हमारे घर से 4 आदमी और उनके घर से 4 आदमी इस्कॉन मंदिर जाएंगे और विवाह की रस्म पूरी कर ली जाएगी। और बाद में जब सब सामान्य हो जाएगा। दोनो परिवार मिलकर बड़ी पार्टी कर लेंगे जिसमे सभी को आमंत्रित किया जाएगा। और कहते कहते वो भावुक हो गए। शर्मा जी उन्हें होंसला दे रहे थे की भाभी जी जल्दी स्वस्थ हो जाएंगी। चिंता न करे। उनके लायक कोई काम हो तो बेहिचक बताये।
तीन दिन बाद पता चला कि भाभी जी की तबियत ज्यादा खराब हो गई है। गैलेक्सी वालो ने हाथ खड़े कर दिए है उन्हें मैक्स में रेफर कर दिया गया है। यानी तबियत ज्यादा खराब।
अब जिस घर मे गीत होने थे। शहनाइयां बजनी थी। मेहंदी संगीत होना था। खुशियां मनाई जानी थी। कपड़े खरीदे जाने थे। हंसी ठट्टा होना था। रूसना मनाना होना था। सबकी जगह अब सूनापन छा गया था। एम्बुलेंस आ चुकी थी। जो उन्हें मैक्स में शिफ्ट करने के लिये ले जा रही थी।
हर्बल दवाइयों वाली भाभी जी जो सबका ख्याल रखती थी। आज ऐसी बीमारी से पीड़ित हो गई जिसमें उनसे डॉक्टर के अलावा कोई नही मिल सकता था। शर्मा जी बहुत दुखी थे वो परमात्मा से दुआ कर रहे थे।कि भाभी जी जल्दी ठीक हो जाये ताकि शादी वाले घर मे वोही शादी वाली रौनक लौट सके।
मनोज शर्मा "मन"

Tuesday, 6 October 2020

 जैसे कल की बात हो"


परमात्मा के आशीर्वाद से जिंदगी के उतार चढ़ाव
में कब कितने वर्ष बीत गये जैसे कल की ही बात हो।

मिलना दो अनजान का और फिर परिणय में बंध जाना
 फिर दो अनजान का एक जान एक सांस बन जाना।।
जैसे ...

खट्टी मीठी यादों के साथ फिर पड़ावों को पार कर जाना
कितनी भी बाधाये आये साथ उनमें अपना साथ निभाना।
जैसे..

मिले थे तो दो थे आज भरा पूरा परिवार बन जाना ।
जो पल साथ सोचे थे आज वो फलीभूत हो जाना।।
जैसे...

आज मित्र है परिवार है समाज है सब है हमारे पास।
पर समय पर तुम्हारा ही साथ सदा तुम्हारा ही नज़र आना 
जैसे...

कहते है रिश्ते आसमां से बन कर आते है सात जन्मों के।
सातों जन्मों तक उनको निभाना भी तुमको ही आता है।।
जैसे...

हर पल हर बरस एक एक फूल को अपने हाथ से संजोना
उन फूलों से आज एक सुंदर बगिया उपवन बना देना ।।
जैसे...

चहकती महकती हिरनी सी तुम उपवन में तब आई थी।
आज उपवन ही उपवन नही उसमे तुम्हारी चहक न हो।।
जैसे...

जीवन मे कोई शिकायत नही सदा हँसना और मुस्कराना 
ताकत बनी रही सुख दुख में सदा मेरे साथ सदा निभाना।
जैसे..

जीवन के कितने बसंत हर्ष उमंग से साथ साथ बीत गए।
पर तुम्हारा अब भी उसी तरह नई दुल्हन नज़र आना।।
जैसे....

मनोज शर्मा "मन"

 कहानी

सबक

ये कहानी है बचपन के मित्रो की जो साथ पढ़े , खेले और बड़े हुये। एक बना बड़ा बिजनेसमैन दूसरा अध्यापक और तीसरा मल्टीनेशनल कंपनी में मैनेजर। सब अच्छा चलता रहा। खेलकूद, मस्ती, जन्मदिन पार्टियां सब कुछ अच्छा चलता रहा।

तभी विनोद जिसका व्यापार कई देशों में था। जब वो अमेरिका में था। तब वो दोस्त जो अध्यापक था उसका फोन आया यार एक अमेरिका से इस बार एक अच्छा सा मोबाइल लेकर आ जाना। विनोद ने पूछा कितनी रेंज तक चलेगा तो सुरेश ने कहा जो तुझे ठीक लगे। विनोद ने एक अच्छा सा फ़ोन जो 70,000 रुपये का था वो ले लिया और साथ मे बिल भी। और फिर अपने काम मे व्यस्त हो गया।

वापस जब आया तो अपने मित्र सुरेश से बोला उसे फोन दिया और साथ मे बिल भी। सुरेश ने विनोद का धन्यवाद भी किया। और फिर बात आई गई हो गई। फिर वो पार्टियां ,मस्तिया मीटिंग्स चलती रही। काफी समय बीत गया । अब तीनो मित्रो का विदेश भृमण का कार्यक्रम बना। तीनो ने पचास पचास हजार मिलाए कार्यक्रम बन गया। टीचर सुरेश के पैसे देवेंद्र ने अपने पास से विनोद को दे दिये। तैयारियां हो चुकी थी। परंतु किसी कारणवश वीज़ा न मिलने से देरी हो गई और कार्यक्रम निरस्त हो गया।

अब देवेंद्र ने पैसे वापस लेने को कहा। विनोद ने कहा बैठते है। विनोद ने देवेंद्र के पचास हजार दे दिये। तो देवेंद्र ने सुरेश के भी पचास हजार देने के लिये कहा टैब विनोद ने कहा कि मैंने सुरेश से मोबाइल के 70,000 लेने है। ये पचास उसमे एडजस्ट हो गये।

देवेंद्र ने सुरेश को बता दिया अब सुरेश ने कहा कि वो फ़ोन तो विनोद ने मुझे गिफ्ट किया था। उसने विनोद को फोन किया कि मैंने तेरे भतीजे को बचपन मे फ्री पढ़ाया था तो फीस नही ली थी। फिर विनोद ने कहा कि जब तेरा मकान बन रहा था तो तो मैंने अपना नया फ्लोर रहने के लिये दिया था तो उसका किराया नही लिया था। ।

अब ये दोस्ती नया रूप ले रही थी। सारे गढ़े मुर्दे उखाड़ रही थी। वो पार्टियां, मस्तिया खत्म हो रही थी। वो लंबी दोस्ती की बाते तू तड़ाक पर जा रही थी। और गुस्से में दोनो की आवाज़ तीखी होती जा रही थी। और गुस्से में दोनो ने फोन रख दिया। ऐसे में विनोद को एक बात समझ नही आ रही थी कि दोस्ती में पैसा भी गया और आज तक जो भी किया वो भी मिट्टी में गया। पैसा मांगना भी बुरा  हो गया। पर एक सबक उसको मिल गया था कि दोस्ती में पैसे का कोई लेन देन नही करना। चेहरे पर गंभीर यादें दिल मे लिये अपनी गाड़ी स्टार्ट कर चल दिया उन्ही बचपन की यादों में ....।

मनोज शर्मा "मन"

 "इतना भी मत "


इतना भी मत आधुनिक बन जाना तुम 
कि दिया बाती अंधविश्वास सा लगे।।

इतना भी मत आधुनिक बन जाना तुम
घण्टियों की आवाज़ शोर लगने लगे।।

इतना भी मत आधुनिक बन जाना तुम
गीता रामायण वेद सिर्फ पुस्तके लगने लगे।।

इतना भी मत आधुनिक बन जाना तुम
माता पिता परिवार बोझ लगने लगे।।

इतना भी मत आधुनिक बन जाना तुम
माँ की लोरिया गीत लगने लगे।।

इतना भी मत आधुनिक बन जाना तुम
मित्रता अब स्वार्थ पूर्ति लगने लगे।।

इतना भी मत आधुनिक बन जाना तुम
कि मेरा अस्तित्व ही तुम्हे न लगने  लगे।।

जब सभी सीमाये लांघ जाओगे तुम
तब फिर प्रकृति तुम्हे मेरा अहसास करायेगी।।

 दौड़ते दम्भी आधुनिक मानव तुम को।
सब कुछ होते हुए भी घरों में कैद कर जायेगी।।

सब अर्थ , काम , सम्पत्ति कुछ काम न आयेगा।
सिर्फ वो ही रह जायेगा जो मेरा नाम गुन गुनायेगा।।

मनोज शर्मा "मन"

 नन्हा वानर

आज सुबह योग के समय एक रोचक घटना घटी जब हम योग करने के बाद अंत मे प्रार्थना कर रहे थे। तब कही से ये वानर का बच्चा आ गया छोटा था। 2 कुत्ते इसके पीछे थे। मैं लाइन में बीच मे खड़ा था । ये वानर का बच्चा उनसे बचने के लिये सीधा मेरे पैरों में आकर चिपक गया। और दोनो कुत्ते एक दम इस पर लपकने के लिये तैयार थे। धर्मसंकट खड़ा हो गया था कि प्रार्थना को बीच मे नही रोका जाता चाहे आंधी आ जाये चाहे वर्षा । पर ये था कि इसको कुत्ते मार देंगे। एक दम से निर्णय किया कि इसकी जान बचानी जरूरी है। सभी को इशारा किया प्रार्थना रोकने का और उन कुत्तों को बाहर भगाया। फिर एक आदमी को गेट पर खड़ा किया कि कुत्ते अंदर न आ सके। और प्रार्थना सुचारू चल सके और ये बालक भी सुरक्षित रहे। प्रार्थना हो गई फिर हमारे मित्र तरुण जी और नताशा जी के घर कीर्तन हुआ था तो वो प्रसाद लेकर आये थे। सभी ने उन्हें चखा और इस नए मेहमान ने भी हमारे साथ बैठकर प्रसाद लिया। अब लगता है इसे हम पर ज्यादा विश्वास हो गया है। वो फिर वृक्षो पर होता चला गया। लगता है कल भी आयेगा।

मनोज शर्मा "मन"

 शर्मा जी का दिल का दौरा"


रोज़ प्रातः योग करना। शाम को टहलना यही दिनचर्या थी उनकी। पर दिन में पब्लिक डीलिंग होने के कारण जो मिल जाए खा लेना। वैसे मीठे का शौक भी था। घर का वातावण भी कुछ ऐसा जहां कुछ न कुछ पकवान रोज़ बनना।

भरी सर्दियों में योग हो गए। पर एक दिन शाम को जब मित्र के साथ टहल रहे थे सर्दी से उनकी  छाती जकड़ गई। सांस फूलने लगी। जिस पार्क के पांच से अधिक चक्कर आराम से लगा लेते थे। दो में ही छाती में और हाथ में दर्द महसूस होने लगा। वो जो अंकल 70 वर्ष के थे और आंटी भी 62 की होंगी। आंटी और वो चक्कर लगते रहे।बैठा तो कुछ आराम मिला। अगले दिन फिर यही हुआ दो चक्कर बाद दर्द शुरू । उनसे तो कुछ नहीं कहा पर शाम को जाना बंद कर दिया। सुबह के योग यू ही  चलते रहे। एक दिन तो आंटी दूसरी आंटी को लेकर ऑफिस आयी। उन्होंने  पूछा तबियत ठीक है। मैंने कहा हां। मै अब नॉर्मल महसूस कर रहा था।पर मुझे सिग्नल मिल गया था कुछ गड़बड़ हो चुकी है।

 कई संस्थाओं में पैर अड़ाए हुए थे। थोड़ा कम किया पर एक दिन हमारी संगठन की हमारी सहयोगी के पिता का निधन हुआ दोपहर को संस्कार होना था।
मेरी हिम्मत नहीं हो रही थी। फिर भी बाइक लेकर निगम बोध गया। वहा काफी धूल उड़ रही थी जो चेहरे से कपड़ों तक ढक चुकी थी। अब घर पर आया तो सोचा नहा लूं। पर जैसे ही बाथरूम में घुसा वो ही छाती फिर अकड़ गई दर्द होने लगा। हाथों में भी। मैंने कैसे भी पानी डाला और  कपड़े पहन बाहर आया। थोड़ा लेट गया श्रीमती से छाती और सिर दबाने के लिए कहा। पर दर्द बढ़ता जा रहा था।

उसने पुत्र को कहा पर वो दूर कहीं था। उसने अपने मित्र को कहा। पर दर्द सहन नहीं हो रहा था। तो मैंने अपनी बाइक निकाली और श्रीमती को बैठने के लिए कहा। वो बोली वो आता होगा। मैंने कहा समय कम है। वो अनमने मन से बैठ गई।और मै सीधा पुष्पांजलि पहुंचा। रिसेप्शन के बाहर हमारे पुराने मित्र तिवारी जी मिल गए दोनों हाथों में थैले थे खुश थे। मैंने उनसे हाथ मिलाया वो कहने लगे में नाना बन गया ....उसी से मिलने आया हूं। मैंने उनको सुभकमनाए दी। पर वो  कुछ और ज़्यादा बात करना चाहते थे।

 उनकी बात वही रोक हम दोनों पति पत्नी इमरजेंसी में चले गए। डॉक्टर को बताया उसने तुरंत इसीजी और बीपी जांच की और तुरंत मैक्स के लिए रेफर  किया।

 वो हैरान था को ये शख्श इस हालत में अपने आप कैसे आया। व्हील चेयर आ गई थी। एम्बुलेंस में बैठाने के लिए मैंने कहा मै ऐसे ही लेट जाऊंगा। तब तक मेरा पुत्र उसका मित्र और मेरे रिश्तेदार भी आ गए थे। मुझे एम्बुलेंस MAX ले गई।

मै पूरे होशो हवास में था। इत्तेफाक से डॉक्टर का नाम भी मनोज कुमार था वो वहां के इंचार्ज थे वो भी प्रसन्न हृदय थे। उन्होंने सब जांच कर कहा स्टंट पड़ेंगे। अभी अभी वो ज़ी न्यूज के इंटरव्यू कार्यक्रम से आए थे।
ऑपरेशन थियेटर में ले जाया गया। मेरे  हाथ में उन्होंने कब सबकुछ कर दिया पता ही नहीं चला फिर मुझे ICU में शिफ्ट कर दिया गया।

ICU अनुभव अपना बहुत ही गंभीर होता है।वहा के स्टाफ ने बहुत ही प्यार से शिफ्ट किया। इंचार्ज वहा प्रिया थी। रात्रि में अलीशा नाम की लड़की मुझे डील कर रही थी। छोटी सी प्रसन्न स्वभाव की उसका चेहरा बिल्कुल मेरी छोटी बिटिया की तरह था उसे देखकर मैं अपना दर्द भूल गया था।

अब रात्रि में कह दिया गया था कि सीधे लेटना है करवट नहीं लेना। सीधे पैर की जांघ में ऑपरेशन हुआ था तो उसके उपर एक ईंट नुमा भारी चीज रखी हुई थी।अमित स्टाफ बार बार आकर मुझसे मेरा हाल पूछ रहे थे। रात में कई बार यूरिन आया तो मै तो उठ भी नहीं सकता था। शम्भू आ जाता था बैल बजाते ही पोट लेकर। वो बेचारा जैसे कोई अपना भी न करे,  उससे ज्यादा सब करवाकर ले जाता था। रात्रि में चार से पांच बार ऐसा हुआ। दर्द में रात गुजरी। 

प्रातः सुबह हुई स्टाफ आ गया। कुल्ला कर लिया। फिर जगन्नाथ नाम का किचन  स्टाफ आ गया। वो मेरे लिए उतपम, दलिया सैंडविच और दूध लाया था। मैंने कहा नहीं खा पाऊंगा। उसने कहा खा लीजिए वरना दवाई कैसे खाएंगे। मुझे उसकी बात जची और मैंने वो नाश्ता ले लिया।
अब पूरा दिन अकेले काटना था। दोनों हाथो में तारे थी। सिर्फ पलंग ही आपका क्षेत्र था। मिलने का समय भी 11 से 11:30 बजे था उस आधे घंटे में पत्नी और पुत्र मिलने आ गए। पूरी रात  वो यही वेटिंग रूम में रहे। पुत्र और भतीजा भी। उन्होंने बताया इतने लोग मिलने आए थे। अब धीरे धीरे दिन बीत गया। मैंने डायरी पेन और चश्मा मंगा लिया था वो आ चुका था।

अगली रात कुछ अच्छी गुजरी। सुबह सुबह अभी स्टाफ वही अपनी क्रिया में थे। पर उनकी इंचार्ज प्रिया कुछ अच्छे स्वभाव की थी। मैंने पूछा तो बताया केरल से है। उनका एक बालक है और  पति दुबई में है। ऐसा कहते हुए वो भावुक सी हो गई। फिर उन्होंने बताया कि केरल एक सुंदर रमणीय जगह है पर वहा भी तीन वर्षो से अब गर्मी बढ़ रही है। कारण बताया पेड़ो का काटना और बड़ी बड़ी इमारतों का बनना। उसने बताया अक्सर वो गांव जाया करती है। मैंने बोला आप सब स्टाफ बहुत अच्छा काम करते है तो उसने बताया हम तो सेवा करते है। सभी स्टाफ बिल्कुल सेवा की तरह ही कार्य कर रहे थे।

अब वार्ड में भेजने की तैयारी हो रही थी। 6 फ्लोर पर  1622 नंबर कमरे में शिफ्ट कर दिया गया। करीब 2-3 गंटे तक जो देखभाल ICU में हो रही थी वो नहीं थी। फिर तीन घंटे बाद वही व्यवस्थाएं सुचारू हो गई थी। श्रीमती और पुत्र भी वार्ड में आ चुके थे और मेरी स्थिति काफी ठीक हो चुकी थी। खुद बाथरूम तक जा सकता था। उपर ICU स्टाफ ने अपने व्यवहार से अकेलेपन का एहसास नहीं होने दिया था।
पर वार्ड में आने का जैसे सभी मिलने वाले इंतज़ार कर रहे थे।

अगला दिन रविवार था हम सब बातचीत कर रहे थे। स्टाफ अपने काम समय पर कर रहे थे। सुबह 6 बजे चाय। 6:30 बजे दवाई  8 बजे नाश्ता उससे पहले इंसुलिन 11 बजे फल 2 बजे भोजन 4 बजे चाय स्नैक्स 7 बजे भोजन और अंत में दूध। सफाई करने वाले चाहे मेरे रूम की हो, मेरे शरीर की हो,  बेडशीट बदलनी हो, मेरे कपड़े बदलने हो कभी भी आपको कोई शिकायत का मौका नहीं।

रविवार 3 बजे तक ठीक बीता। 3 बजे शाम से रिश्तेदार, मित्रो के मिलने जुलना लग गया। डॉक्टर मनोज कुमार जी ने ज़्यादा लोगो से मिलने के लिए मना कर दिया था। इसीलिए पुत्र ज़्यादातर को फोन पर ही संतुष्ट कर रहा था।
‌फिर भी मिलने वाले जुगत लगाकर आ रहे थे। सुरेन्द्र पांडे जी का बरेली में गाड़ी का ऐक्सिडेंट हो गया था। उन्हें जैसे मालूम चला अपना वो सारा काम छोड़ मिलने आ पहुंचे। सभी एक बार  मिलना चाहते थे बात करना चाहते थे। पर मै 2 घंटे  में काफी थक गया था। मुझे अपने वरिष्ठ गुरमुख जी और आंटी जी का भी इंतज़ार था। मुझे लगा शायद उन्हें मालूम नहीं चला। कुछ समय बाद गुरमुख जी और रिहानी जी भी मिलने आ गए। वो दुखी थे क्योंकि गुरमुख जी आजसे 4 वर्ष पहले मिले थे। वो बहुत कमजोर स्तिथि में थे। पार्क के दो चक्कर भी नहीं लगा पाते थे। फिर हमसे जुड़े और योग किए। आज वो 70 वर्ष की आवस्था के में भी हमसे यंग थे। तो उनके परिवार से जुड़ाव सा हो गया था। श्रीमती जी के बताया की राजेन्द्र जी घर आए थे तो रो रहे थे। असल में क्षेत्र में किसी को अपेक्षा नहीं थी कि एक स्वस्थ व्यक्ति को भी अटैक हो सकता है। जो  सभी के सुख दुख में काम आता हो। पर अपने शरीर का तो शर्माजी को ही पता था। ब्लड प्रेशर पिताजी से और शुगर माताजी से वंशानुगत आ गया था। ये काम तो आज से 10 वर्ष पहले हो जाता। योग ने और सैर से 10 वर्ष आगे बढ़ा दिया। 

 अगले दिन छुट्टी होनी थी। जो मिलने आ रहा था सुझाव दे रहा था इनसे किसी को ज़्यादा देर मिलने मत देना। आराम करवाना। पर उसकी खुद इच्छा थी मुझसे ज्यादा से ज्यादा बात करता जाए।

होली का प्रोग्राम था। तो सभी मित्रो में नीरसता आ गई। मैंने वहीं से हलवाई को 100 ब्रेड और दूध वाले को 25 किलो दूध का ऑर्डर दे दिया। और सभी को कहा त्यौहार पूरी खुशी से मनाना चाहिए। मेरा भी मन था। ज़िन्दगी में पहला अवसर था कि मै उनके बीच रहकर उसका आनंद नहीं ले पाऊंगा। मै थक गया था फिर सो गया। कई मित्र आए और मुझे सोता हुआ देख डिस्टर्ब ना करे चले गए। 

देर रात्रि किचन के इंचार्ज आए पूछा कोई हमारे भोजन वगैरह में  कोई कमी तो नहीं। मैंने कहा लाजवाब। पर मैंने कहा कल  कोई साउथ इंडियन डिश नाश्ते में भिजवाए। तब उन्होंने कहा सर हमारे यहां फिक्स होता है फिर भी फोन पर पूछता हूं। तब उन्होंने कहा सर कल साउथ इंडियन डिश ही बन रही है। खुशी हुई।

अगली सुबह आज यहां से डिस्चार्ज होना हैं। चाय आ चुकी है। आज होलिका दहन है। आज पूजा होनी है। श्रीमती को पूजा के लिए घर जाना है। मै फ्रेश भी नहीं हुआ था। सफाई वाला आ चुका था। मैंने घर से शेविंग का सामान मंगवाया था। पर बताया था शेविंग करने आता है। फिर उसने फोन किया तो शेविंग वाला युवक आया उसने मेरी शेविंग की। 

ऐसा लगता था कि आपके हाथ में चिराग है.. आई सी यू में मधु स्मिथ मुस्कान लिए बताइए क्या कर सकते है।  चिराग रगड़ो तो प्रिया इंचार्ज ICU में उनके स्टाफ अमित, सुजीत,सेजिया सिंटू.. अपर्णा, निशा, सत्या, मीनू सभी आपकी सेवा में तत्पर।

वार्ड में डाइटीशियन चित्राजी मुस्कान लिए फ्लोर इंचार्ज 
जुहेब अली, हाउस कीपर..स्टाफ बबिताजी, सोनिया जी.. पुष्पेन्द्र, रजनी फूड सर्विस, प्रेरणा शर्मा, सुनीता जी,  नीरज, सुनील, अजय, रोहित, नंदिनी और डॉक्टर मोहित अरोड़ा, डॉक्टर निशांत त्यागी जी सदा सेवा में तत्पर रहते थे।

शायद ये सब भी ज़िन्दगी के अनुभव होते है। जहा अपने किसी के साथ कैसे व्यवहार किया है वो काम आता है। कहते है समाज को एक गाली दो तो चार वापस आती है। तो क्यों ना समाज को प्यार बांटा जाए। बताते है किसी ऐसे समय में सभी चाहते है ज़्यादा लोग ना आए और ना आए तो लगता है वो नहीं आए।इस भीड़ में भी मै खोजता रहा कुछ अपने बचपन के मित्र जो बड़ी बड़ी कसमें खाया करते थे मित्रता की और अपने चार खास रिश्तेदार जो शायद ज्यादा व्यस्त थे। एक तरफ वो भीड़ का समूह जो डॉक्टर के कहने से मुझसे मिल नहीं पा रही थी। 

पर डिस्चार्ज होने सभीपरिवार के लोग खुश थे। घर में अलग कमरा साफ कर दिया गया था। पर्दे, चादर,..मेरे को जो भी सामान चाहिए था बता रहे थे पूरी तैयारी कर दी गई  थी। मुझे हिदायत से दी गई थी कि आप किसी से 2 मिनट से ज़्यादा बात नहीं करेंगे।
पहले मैं डॉक्टर्स के नियंत्रण में था अब दोनों बेटियों और बेटे की। चार्ट सारणी सामने लग गई थी दवाई के और भोजन की। सभी मुझे इंस्ट्रक्शन दे रहे थे। 50 वर्षों में आज लग रहा था अब सभी बच्चे बड़े हो गए है।

 इन सबमें को मुझे दुखद लग रही थी पहली होली 50 वर्षो में जो अपने मित्रो के साथ खेल नहीं पाऊंगा 

मनोज शर्मा "मन"

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Monday, 5 October 2020

 जिन्दगी की कशमकश

रुक जाते है जब भी कदम तो सांस ले लेता हूँ |
वरना मेरे मित्र मुझे कहा विश्राम करने देते है ||
मुस्करा लेता हूँ जब अपने कही रोक लेते है |
वरना ये कदम कब हमें रुकने देते है ||
थाम लेता जब भी कलम लिखने के लिए उसका जिक्र |
तो ये हाथ कमबख्त उन हाथो को ही रोक देते है ||
हमारा भी तो मुस्कराने का हक़ है इस व्यस्त जीवन में |
जिंदगी की कशमकश में कहा हम जीते है ||
वो समुन्द्र हमें सदा से जीने का सन्देश देता है |
रहता तो शांत है पर लहरों को उछलने देता है ||
भंवरा भी तो पुष्प को सदा प्रेम का ही सन्देश देता है |
वर्ना पुष्प भी कहा ऐसे किसी को अपना मधु देता है ||
जीवन में कुछ थक जाते है कुछ रुक जाते है कुछ ठहर जाते है |
वरना तैरने वाले कब किसके इंतज़ार में बैठा किनारे रहता है ||
ये काफिला है जीवन का चल सकता है तो चल फिर एक नई राह |
वरना खानाबदोस मुसाफिर कब अपने मकान में रहता है ||
आइना देखता हुआ हर शक्श निहारता रहा उसमे अपना अक्स |
पर आइने में उसका अक्स उसे कब झूठ का लिबास देता है ||
पश्चिम में ढलने वाला ,पूर्व से उग कर फिर से एक सन्देश देता है |
दुखी मत हो कभी इस जीवन में , दुःख में कभी कोई साथ होता है ||
फिर नया साथ फिर नया सफ़र चलेंगे फिर ऐ मन |
लेकर फिर नए दोस्त और नई इबारत लिखेंगे हम ||
मनोज शर्मा "मन"

 "संघ शक्ति कलयुगे "

हर रूप में पूजोगे
हरी को ही पाओगे
मुर्दों कब्रों को पूजोगे
भूत प्रेत ही पाओगे ||
हर व्यक्ति अपने जैसे चाहता
हरी जपने से हर मिल जाता
भूत प्रेत को जो जपता
हर जगह उसको श्मशान ही दीखता ||
जीते जी हो सकता है
तेरी कुछ मुरादे पूरी हो जाये
मरने के बाद सिर्फ हरी याद आये
मुर्दे जपने से तू भी गति न पाये ||
मुर्दों के भी पुजारी बन
कुछ लोग अपना धंधा चलाये
पर ऐसा पैसा कभी किसी
को कभी रास न आये |
हरी के भजन तुझे
इस जगत में तो पुण्य दिलाये ही
और मरने के बाद तू अपने को
हरी के चरणों में ही पाये ||
हरी को मन में ढूंढ
मन्दिर में ढूंढ
वेड और पुराण में ढूंढ
तू उसे पाये पाये
पर हरी तुझे जरूर पा लेगा ||
हरी तुझे कर्म के लिए कह गया
और तू काण्ड में उलझ गया
निकल काण्ड से और मुर्दों से
देख किसी गरीब को और उसे ही हरी समझ
कर संगठन उनका
और कर एक उन्हें
मिलेंगे हरी तुझे वही
कह गए गीता में हरी यही
संघ शक्ति कल्युगे ||
मनोज शर्मा "मन"

 मधुमक्खी से सीखे कैसे जीना

हमे अपना जीवन कैसे जिये मधुमक्खी से सीखना चाहिये, शहद भी बनाना और सामने वाले के मन मे डर भी बना कर रखना की ये संगठन में रहती है और हमला भी कर सकती है। जब शहद तैयार हो जाता है ये फिर दूसरा छःत्ता शहद का तैयार करने लगती है। लेकिन ये करती संगठन में रहकर ही है। और इसमें सारा श्रेय प्रत्येक मधुमक्खी को जाता है। हर मधुमक्खी का काम बंटा होता है। इसी को संगठन भी कहते है।
कई बार हम मिलते है कार्यकर्ता सिर्फ अपने बारे में बखान करता रहता है मैंने ये किया मैंने वो किया। इसका मतलब वो संगठन में रहते हुये भी और ऊंचे दायित्वों पर होंने के बाद भी अपनी व्यक्तिगत महत्वकांक्षाओं पर पार नही पा सका।
कार्यकर्ता वही जो जब मिले तो हम का सम्बोधन करे। कि हमने मिलकर या हमारे संगठन को सर्वोपरि रखे। अपने नाम की जगह संगठन को अहमियत दे। उसमे सदा देने का भाव रहे। जैसा मधुमक्खियों में रहता है। वो शहद समाज को देती है। इसके बदले में कुछ नही लेती है यहां तक कि उनको उस शहद का श्रेय भी नही मिल पाता है।
हमे अपने जीवन मे भी शहद भी बनाते रहना चाहिये और कोई ये भी न समझे हम अकेले है तो संगठन में भी रहना चाहिये। क्योंकि कोई भी अकेली मधुमक्खी शहद का निर्माण नही कर सकती है। इसी तरह मानव स्वभाव भी उसे संगठन में रहने का ही भाव देता है।
मनोज शर्मा "मन"

 अब मौन बहुत हो गया।

अब मौन बहुत हो गया।
अब वक्त है मुखर होने का।।
अब श्रद्धांजलियां बहुत हो गई।
अब वक्त है बलि लेने का।
अब बातचीत और गले बहुत लग लिये।
अब वक्त है अजगर को दफन करने का।।
अब गालिया सुना सेना को बहुत हो गया।
अब वक्त है पत्थरबाजों को सबक सिखाने का।।
अब शांति पर चलने का समय बहुत हो गया।
अब वक्त है दुश्मन को उसकी औकात बताने की।
सीमा पर अब शांति बहुत हो गई।
अब वक्त है इन सीमाओ को फिर से मिलाने का।
धर्मनिरपेक्षता, शांति, 370 का समय बहुत हो गया।
अब वक्त है उनको उनकी भाषा मे सबक सिखाने का।।
आतांकियो के लिये दया धर्म बहुत हो गया।
अब वक्त है सेना को भी छूट दे अब सीमा पार जाने की।
अजगर अजगर होता है पालतू हो या जंगल मे हो।
कितना भी पुचकार लो वो रहेगा फिराक में निगल जाने की।।
जनता फौजी युवा सभी दे रहे एक आवाज़।
अब नही किया इन्हें ज़मीन में दफन, फिर नही घड़ी ये आने की।।
मनोज शर्मा "मन""

 “मित्रता कृष्ण सुदाम सी”

मिल जाते है जहाँ मित्र कभी |
बैठ जाते है यू ही उसके घर मे ।|
चाय पर नाश्ते पर घरवालो के साथ |
बातें न हैसियत की होती है ||
न अपने गुमान की कभी |
न पार्टी की न राजनीति की कभी ||
हंसते है मुस्कराते है खिलखिलाते |
एक दूसरे से है नज़रे मिलाते ||
गम भूल जाते है मिलकर सभी |
गले फिर से लग जाते है सभी ||
कोई कहता मित्रता सिर्फ बचपन में ही होती |
मैं कहता दिल बच्चा से बनोगे तो होगी अभी ||
जब मिलो मित्रो से कृष्ण सुदामाँ बन कर मिलो |
न हो कोई बात कोई और सिर्फ मुस्कराते मिलो ||
न रखो उसकी दुखती रख पर हाथ अपना कोई |
हो उसकी कोई समस्या करो हल मिल कर अभी ||
न पीछे कोई भी उसके उसकी कोई बात हो |
सिर्फ दोस्त का भला हो ये ही जज्बात हो ||
मै सही वो गलत ऐसी बात दिल में न लाना कभी
वो भी सही मैं भी सही ये बात दिल में ही सही ||
दोस्त मेरा दोस्त रहे ऐसा करे अगर प्रयास सभी |
तो रब भी हो जाता उसका कायल कहते ज्ञानी सभी ||
अपना तन मन जीवन तो मित्रो के लिए ही है सदा से अर्पण |
दोस्त रहे सुखी, स्वस्थ,और खुशियों से भर जाये उसका जीवन ||
मनोज शर्मा “मन”

 जिन्दगी की कशमकश

रुक जाते है जब भी कदम तो सांस ले लेता हूँ |
वरना मेरे मित्र मुझे कहा विश्राम करने देते है ||
मुस्करा लेता हूँ जब अपने कही रोक लेते है |
वरना ये कदम कब हमें रुकने देते है ||
थाम लेता जब भी कलम लिखने के लिए उसका जिक्र |
तो ये हाथ कमबख्त उन हाथो को ही रोक देते है ||
हमारा भी तो मुस्कराने का हक़ है इस व्यस्त जीवन में |
जिंदगी की कशमकश में कहा हम जीते है ||
वो समुन्द्र हमें सदा से जीने का सन्देश देता है |
रहता तो शांत है पर लहरों को उछलने देता है ||
भंवरा भी तो पुष्प को सदा प्रेम का ही सन्देश देता है |
वर्ना पुष्प भी कहा ऐसे किसी को अपना मधु देता है ||
जीवन में कुछ थक जाते है कुछ रुक जाते है कुछ ठहर जाते है |
वरना तैरने वाले कब किसके इंतज़ार में बैठा किनारे रहता है ||
ये काफिला है जीवन का चल सकता है तो चल फिर एक नई राह |
वरना खानाबदोस मुसाफिर कब अपने मकान में रहता है ||
आइना देखता हुआ हर शक्श निहारता रहा उसमे अपना अक्स |
पर आइने में उसका अक्स उसे कब झूठ का लिबास देता है ||
पश्चिम में ढलने वाला ,पूर्व से उग कर फिर से एक सन्देश देता है |
दुखी मत हो कभी इस जीवन में , दुःख में कभी कोई साथ होता है ||
फिर नया साथ फिर नया सफ़र चलेंगे फिर ऐ मन |
लेकर फिर नए दोस्त और नई इबारत लिखेंगे हम ||
मनोज शर्मा "मन"

 "आज की नारी"

प्रातः सबसे पहले उठ जाती है।
सबको सुला फिर अंत मे सोती है।।
बालको की चिंता में सदा रहती।
जीवन मे पल पल एक नया जीवन जीती।।
कब वो कन्या से बेटी, बेटी से पत्नी और पत्नी से माँ बन जाती।
हर रूप में वो तो ढलती ही जाती।।
अपना घर छोड़ दूसरे घर को सींचती ।
ताने सहती रहती ,पर कुछ न कहती।।
संस्कृति जिसके कंधो पर है विराजती।
घर के साथ आज समाज मे भी अग्रसर रहती।।
अब वो भी किसी पर न निर्भर रहती।
घर के साथ साथ देश को भी है चलाती।।
नमन है इस शक्ति को नमन है इस भक्ति को।
नमन उसके योगदान को नमन उसके बलिदान को।।
आज वो इंदिरा नुई, पी टी उषा , सुषमा स्वराज, सीतारमण कहलाती।
वो है आज की नारी जिससे हर असम्भव बात सम्भव हो जाती।।
मनोज शर्मा "मन"

 “है तो मेरा दोस्त”

गुमान में रहता है ,
अभिमान में रहता है |
ध्यान देना जब से बंद किया उस पर |
तो परेशान सा रहता है ||
मिलता था तो घंटो बाते किया करता था |
अब मिलता है तो खुद का ही बखान करता है |
जब चाहे बाते करने बंद कर देता है |
कभी फिर से हंस के गले मिल जाता है ||
अक्सर मुझसे कब क्या क्या बोल जाता है |
और अक्सर मुझसे नाराज़ भी हो जाता है ||
बीमार हो जाता हूँ तो हाल चाल भी पूछ जाता है |
ठीक ठाक हूँ तो कभी कभी मिलने भी नहीं आता है ||
जो भी बात करू उसका उल्टा ही जवाब देता है |
न बात करू तो खुद ही सवाल कर जाता है ||
उम्र के इस पढाव में अब मैंने भी
कुछ प्रतिक्रिया देना छोड़ दिया है ||
अब मैंने भी उसको उसके ही हालात
पर ऐसे ही छोड़ दिया है बेरूखी में ||
अब शायद उसको मुझसे ज्यादा
कोई चाहने वाला मिल गया है |
पर जहा भी रहे जैसे भी रहे |
खुशहाल रहे सुखी रहे जैसा भी है ||
है तो मेरा दोस्त
मनोज शर्मा "मन"

 " ज़माने को कहाँ फिक्र है"

जीवन एक सफर है मुस्कराते चले जाओ।
कौन कब छूटा ये रास्तो को कहा फिक्र है।
कौन मिला उससे साथ निभाते चलो।
काफिला कहा कहा लुटा ज़माने को कहा फिक्र है।।
अफसोस उनका मत करो जो चल नही सके मंजिलो की और।
मंजिलो तक पहुचने वालो को छूटने वालो की कहाँ फिक्र है।।
छत्ते तोड़ने वाले तेरा शहद निकालते जायेंगे।
पर मधु बंनाने वाली मधुमक्खियों को शहद कब लुटा इसकी कहाँ फिक्र है।
कोयल का रंग काला है ये अक्सर लोग देखते है।
पर कोयल तो कूकती रहती है उसे अपने रंग की कहाँ फिक्र है।।
गजराज स्वागत करने वालो और भौकने वालो के लिये कहा रुकता।
वो अपनी मस्ती में चलता रहता उसे इन सबकी कहाँ फिक्र है।।
नदिया नीर बहा कर शोर मचाती फिर समुंदर में मिलती जाती।
पर सागर शांत रहता कितना नीर उसमे मिल गया इसकी उसको कहाँ फिक्र है।।
बसंत ऋतु आई फिर से चारो और फाग की खुशिया छाई।
नये पत्ते कितने लगे कितने गिर गये।इसकी गिनती की बसंत को कहाँ फिक्र है।।
इसलिये नया पल का करो स्वागत हर पल जीवन में ।
जो रोते चले गये जीवन मे उनकी भी ज़माना करता कहां फिक्र है।।
मनोज शर्मा "मन"

  सड़क दुर्घटना

सड़क दुर्घटना रोज़ मर्राह का हिस्सा है जिंदगी का। अक्सर हम कही जा रहे होते है तो अक्सर सड़क के साइड में भीड़ देखते है और सोचते है किसी की दुर्घटना हो गई है शायद ,थोड़ी उत्सुकता रहती है गाड़ी रोक कर पूछते है तो कोई बताता है और हम जानकारी लेकर निकल जाते है। रास्ते मे सोचते हुए कोई न कोई आ जायेगा इनकी सहायता के लिये दुनिया मे अच्छे लोग भी है। कुछ लोग इसलिये भी डरते है कि कौन पुलिस के लफड़ो में पड़े। एक तो सहायता करो और फिर कानूनी उलझनों में फँसो। फिर किसी अस्पताल में ले जाओ तो फिर उसके साथ खड़े रहो। प्राइवेट में गये तो बिल कौन देगा। अब कौन झंझट में पड़े।
हमारे क्षेत्र में एक व्यक्ति है जो साहिबाबाद में रेस्टोरेंट चलाते है वो शाम को घर निकले तो रास्ते मे देखा किसी की दुर्घटना हो गई है। उन्होंने पूछा तो किसी ने बताया किसी मोटर साईकल वाले को ट्रक वाला ठोक गया है। हालत गंभीर है। और वो वहां से जल्दी थी घर आने की। वो इतनी जानकारी लेकर अपने घर को चल दिये।
घर पहुचे तो घर मे कोहराम मचा था। पूछा तो छोटे भाई का एक्सीडेंट हुआ है चोट ज्यादा लगी फोन आया है तो वो फ़ौरन उस और की और गये। भाई को लेकर हॉस्पिटल पहुचे तो उन्हें बताया गया कि आप पहले ले आते तो हम उनको बचा लेते। तो उस व्यक्ति की हालत शून्य हो गई और रोते रोते कह रहे थे काश मैं रुक कर देख लेता तो मेरा भाई मेरे साथ होता।
आज सरकार ने कानून बना दिया है कि आप घायल को सीधा पुलिस को सूचित करें या अस्पताल ले जाये आपसे कोई पूछताछ नही की जायेगी। न कोई पेपर वर्क ही किया जायेगा। आपकी वजह से किसी आदमी की जान बच सकती है। वो आपका कोई अपना भी हो सकता है और आप खुद भी हो सकते है।
तो जब भी हम ऐसी घटना को देखे तो उसे इग्नोर न करे। जो सहायता बन पड़ सकती है। करे।
मनोज शर्मा "मन"

 बिटिया बड़ी हो गयी, एक रोज उसने बड़े सहज भाव में अपने पिता से पूछा - "पापा, क्या मैंने आपको कभी रुलाया" ?

पिता ने कहा -"हाँ "
उसने बड़े आश्चर्य से पूछा - "कब" ?
पिता ने बताया - 'उस समय तुम करीब एक साल की थीं, घुटनों पर सरकती थीं। मैंने तुम्हारे सामने पैसे, पेन और खिलौना रख दिया क्योंकि मैं ये देखना चाहता था कि, तुम तीनों में से किसे उठाती हो तुम्हारा चुनाव मुझे बताता कि, बड़ी होकर तुम किसे अधिक महत्व देतीं। जैसे पैसे मतलब संपत्ति, पेन मतलब बुद्धि और खिलौना मतलब आनंद।
मैंने ये सब बहुत सहजता से लेकिन उत्सुकतावश किया था क्योंकि मुझे सिर्फ तुम्हारा चुनाव देखना था। तुम एक जगह स्थिर बैठीं टुकुर टुकुर उन तीनों वस्तुओं को देख रहीं थीं। मैं तुम्हारे सामने उन वस्तुओं की दूसरी ओर खामोश बैठा बस तुम्हें ही देख रहा था।
तुम घुटनों और हाथों के बल सरकती आगे बढ़ीं, मैं अपनी श्वांस रोके तुम्हें ही देख रहा था और क्षण भर में ही तुमने तीनों वस्तुओं को आजू बाजू सरका दिया और उन्हें पार करती हुई आकर सीधे मेरी गोद में बैठ गयीं।
मुझे ध्यान ही नहीं रहा कि, उन तीनों वस्तुओं के अलावा तुम्हारा एक चुनाव मैं भी तो हो सकता था। तभी तुम्हारा तीन साल का भाई आया ओर पैसे उठाकर चला गया,वो पहली और आखरी बार था बेटा जब, तुमने मुझे रुलाया.. और बहुत रुलाया।
आखिर बेटी तो बेटी ही होती है ख़ुदा की दी हुई सबसे अनमोल धरोहर है बेटी........

 आंटी के हाथ की रसमलाई का आनंद

रोज़ की तरह आज शनिवार की शाम को मैं और मेरे मित्र अशोक रेहानी जी शाम की सैर को निकले चिल्ड्रन पार्क की और। हल्की हल्की वर्षा हो रही थी। आगे थोड़ा गये तो तेज़ हो गई। अपनी बाइक मोड़ी वापस की और तो देखा हरीश जी अपने आफिस में बैठे थे अकेले थे। हमारा टहलने का समय शाम 6 से 7 होता है। हम उनके आफिस में बैठ गये ।वार्तालाप शुरू हुआ तभी वहां से भेलपुरी वाला निकला। हरीश जी ने तीन पत्ते बनवाये उनका आनंद लिया । अब साढ़े छह बजे थे। आधा घण्टा बाकी था।
मैंने गुरमुख जी को फोन मिलाया वो वही आफिस के पास था। उन्होंने कहा घर पर हूँ। मैंने कहा हम आ रहे है। घर पहुँचे। वैसे गुरमुख जी हमारी शाखा के सबसे सक्रिय बुजुर्ग है। वो जितने दिन भी भारत मे होते है समय से शाखा पहुँच जाते है। उनका एक पुत्र गुरदीप है उनकी एक बहु और एक पोता और चार पुत्रियां है। गुरदीप ऑस्ट्रेलिया में है। तो गुरमुख सिंह जी भी ऑस्ट्रेलिया और भारत मे दोनो जगह आते जाते रहते है। उनके पुत्र, बहु का व्यवहार भी बहुत ही बढ़िया है। और पोता तो बहुत ही चुलबुल नटखट है दादी का प्यारा।
हम जैसे ही घर पहुँचे बाहर हल्की हल्की बारिश हो रही थी। गुरमुख जी बिना पगड़ी के थे। आंटी जी के भी पैर की उंगली में कुछ चोट लग गई थी। नही तो ये दम्पत्ति रोज़ हमारे साथ वही टहलने जाती है। दोनो के चेहरे पर मुस्कराहट थी। गुरमुख जी ने पगड़ी बांधनी शुरू कर दी। आंटी फटाफट आज अपने हाथों की बनाई रस मलाई ले आई थी। और साथ मे कलाकंद भी।
गजब का स्वाद था। गुरमुख जी ने बताया अभी तुम्हारी आंटी तुम्हे ही याद कर रही थी। कह रही थी ये कलाकंद और ये रसमलाई मंनोज के आफिस में दे आओ। अभी कह ही रही थी कि आपका फोन आ गया। मैंने कहा मुझे भी कुछ लगा और मैं भी आ गया। फिर मैंने रसमलाई का आनंद लेने लगा। वो मुझे इसके बनाने की विधि बता रही थी। कैसे उन्होंने बनाई। मैं रसमलाई का आनंद भी ले रहा था उनकी बातें भी सुन रहा था वो बहुत ही प्यार से रसमलाई और कलाकंद बनाने की विधि बता रही थी। कलाकंद भी अच्छी बनी हुई थी। एक पीस उसका भी खाया।
फिर गुरमुख जी अपने हाथों से चार कप ग्रीन टी लेमन फ्लेवर में बना कर लाये। मैने कहा गुरमुख जी भी बना लेते है तो आंटी जी ने मुस्करा कर कहा वैसे कर लेते है लेकिन आज मेरे चोट लगी है तो कर भी रहे है। चाय आ चुकी थी। चाय भी गजब थी। दोनो दम्पत्ति बाते कर रहे थे प्रसन्न थे हमारे आने पर । अब सात बज चुके थे। आफिस से फोन भी आने लगे थे पर न उनका दिल भरा था न हमारा ।
थोड़ी सी नमकीन भी चखकर आंटी और उनमें अपने माता पिता का स्वरूप देखता हुआ उन्हें प्रणाम कर मैं भावों में डूबा वहां से चल पड़ा। मेरी माता भी कुछ मीठा बनाती थी तो वो भी मेरे लिये अलग से रखती थी कि मंनोज को ये अच्छी लगती है।
मंनोज शर्मा "मन"