"संघ शक्ति कलयुगे "
हर रूप में पूजोगे
हरी को ही पाओगे
मुर्दों कब्रों को पूजोगे
भूत प्रेत ही पाओगे ||
हर व्यक्ति अपने जैसे चाहता
हरी जपने से हर मिल जाता
भूत प्रेत को जो जपता
हर जगह उसको श्मशान ही दीखता ||
जीते जी हो सकता है
तेरी कुछ मुरादे पूरी हो जाये
मरने के बाद सिर्फ हरी याद आये
मुर्दे जपने से तू भी गति न पाये ||
मुर्दों के भी पुजारी बन
कुछ लोग अपना धंधा चलाये
पर ऐसा पैसा कभी किसी
को कभी रास न आये |
हरी के भजन तुझे
इस जगत में तो पुण्य दिलाये ही
और मरने के बाद तू अपने को
हरी के चरणों में ही पाये ||
हरी को मन में ढूंढ
मन्दिर में ढूंढ
वेड और पुराण में ढूंढ
तू उसे पाये पाये
पर हरी तुझे जरूर पा लेगा ||
हरी तुझे कर्म के लिए कह गया
और तू काण्ड में उलझ गया
निकल काण्ड से और मुर्दों से
देख किसी गरीब को और उसे ही हरी समझ
कर संगठन उनका
और कर एक उन्हें
मिलेंगे हरी तुझे वही
कह गए गीता में हरी यही
संघ शक्ति कल्युगे ||
मनोज शर्मा "मन"
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