Monday, 5 October 2020

 “मित्रता कृष्ण सुदाम सी”

मिल जाते है जहाँ मित्र कभी |
बैठ जाते है यू ही उसके घर मे ।|
चाय पर नाश्ते पर घरवालो के साथ |
बातें न हैसियत की होती है ||
न अपने गुमान की कभी |
न पार्टी की न राजनीति की कभी ||
हंसते है मुस्कराते है खिलखिलाते |
एक दूसरे से है नज़रे मिलाते ||
गम भूल जाते है मिलकर सभी |
गले फिर से लग जाते है सभी ||
कोई कहता मित्रता सिर्फ बचपन में ही होती |
मैं कहता दिल बच्चा से बनोगे तो होगी अभी ||
जब मिलो मित्रो से कृष्ण सुदामाँ बन कर मिलो |
न हो कोई बात कोई और सिर्फ मुस्कराते मिलो ||
न रखो उसकी दुखती रख पर हाथ अपना कोई |
हो उसकी कोई समस्या करो हल मिल कर अभी ||
न पीछे कोई भी उसके उसकी कोई बात हो |
सिर्फ दोस्त का भला हो ये ही जज्बात हो ||
मै सही वो गलत ऐसी बात दिल में न लाना कभी
वो भी सही मैं भी सही ये बात दिल में ही सही ||
दोस्त मेरा दोस्त रहे ऐसा करे अगर प्रयास सभी |
तो रब भी हो जाता उसका कायल कहते ज्ञानी सभी ||
अपना तन मन जीवन तो मित्रो के लिए ही है सदा से अर्पण |
दोस्त रहे सुखी, स्वस्थ,और खुशियों से भर जाये उसका जीवन ||
मनोज शर्मा “मन”

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