जिन्दगी की कशमकश
रुक जाते है जब भी कदम तो सांस ले लेता हूँ |
वरना मेरे मित्र मुझे कहा विश्राम करने देते है ||
मुस्करा लेता हूँ जब अपने कही रोक लेते है |
वरना ये कदम कब हमें रुकने देते है ||
थाम लेता जब भी कलम लिखने के लिए उसका जिक्र |
तो ये हाथ कमबख्त उन हाथो को ही रोक देते है ||
हमारा भी तो मुस्कराने का हक़ है इस व्यस्त जीवन में |
जिंदगी की कशमकश में कहा हम जीते है ||
वो समुन्द्र हमें सदा से जीने का सन्देश देता है |
रहता तो शांत है पर लहरों को उछलने देता है ||
भंवरा भी तो पुष्प को सदा प्रेम का ही सन्देश देता है |
वर्ना पुष्प भी कहा ऐसे किसी को अपना मधु देता है ||
जीवन में कुछ थक जाते है कुछ रुक जाते है कुछ ठहर जाते है |
वरना तैरने वाले कब किसके इंतज़ार में बैठा किनारे रहता है ||
ये काफिला है जीवन का चल सकता है तो चल फिर एक नई राह |
वरना खानाबदोस मुसाफिर कब अपने मकान में रहता है ||
आइना देखता हुआ हर शक्श निहारता रहा उसमे अपना अक्स |
पर आइने में उसका अक्स उसे कब झूठ का लिबास देता है ||
पश्चिम में ढलने वाला ,पूर्व से उग कर फिर से एक सन्देश देता है |
दुखी मत हो कभी इस जीवन में , दुःख में कभी कोई साथ होता है ||
फिर नया साथ फिर नया सफ़र चलेंगे फिर ऐ मन |
लेकर फिर नए दोस्त और नई इबारत लिखेंगे हम ||
मनोज शर्मा "मन"
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