आंटी के हाथ की रसमलाई का आनंद
रोज़ की तरह आज शनिवार की शाम को मैं और मेरे मित्र अशोक रेहानी जी शाम की सैर को निकले चिल्ड्रन पार्क की और। हल्की हल्की वर्षा हो रही थी। आगे थोड़ा गये तो तेज़ हो गई। अपनी बाइक मोड़ी वापस की और तो देखा हरीश जी अपने आफिस में बैठे थे अकेले थे। हमारा टहलने का समय शाम 6 से 7 होता है। हम उनके आफिस में बैठ गये ।वार्तालाप शुरू हुआ तभी वहां से भेलपुरी वाला निकला। हरीश जी ने तीन पत्ते बनवाये उनका आनंद लिया । अब साढ़े छह बजे थे। आधा घण्टा बाकी था।
मैंने गुरमुख जी को फोन मिलाया वो वही आफिस के पास था। उन्होंने कहा घर पर हूँ। मैंने कहा हम आ रहे है। घर पहुँचे। वैसे गुरमुख जी हमारी शाखा के सबसे सक्रिय बुजुर्ग है। वो जितने दिन भी भारत मे होते है समय से शाखा पहुँच जाते है। उनका एक पुत्र गुरदीप है उनकी एक बहु और एक पोता और चार पुत्रियां है। गुरदीप ऑस्ट्रेलिया में है। तो गुरमुख सिंह जी भी ऑस्ट्रेलिया और भारत मे दोनो जगह आते जाते रहते है। उनके पुत्र, बहु का व्यवहार भी बहुत ही बढ़िया है। और पोता तो बहुत ही चुलबुल नटखट है दादी का प्यारा।
हम जैसे ही घर पहुँचे बाहर हल्की हल्की बारिश हो रही थी। गुरमुख जी बिना पगड़ी के थे। आंटी जी के भी पैर की उंगली में कुछ चोट लग गई थी। नही तो ये दम्पत्ति रोज़ हमारे साथ वही टहलने जाती है। दोनो के चेहरे पर मुस्कराहट थी। गुरमुख जी ने पगड़ी बांधनी शुरू कर दी। आंटी फटाफट आज अपने हाथों की बनाई रस मलाई ले आई थी। और साथ मे कलाकंद भी।
गजब का स्वाद था। गुरमुख जी ने बताया अभी तुम्हारी आंटी तुम्हे ही याद कर रही थी। कह रही थी ये कलाकंद और ये रसमलाई मंनोज के आफिस में दे आओ। अभी कह ही रही थी कि आपका फोन आ गया। मैंने कहा मुझे भी कुछ लगा और मैं भी आ गया। फिर मैंने रसमलाई का आनंद लेने लगा। वो मुझे इसके बनाने की विधि बता रही थी। कैसे उन्होंने बनाई। मैं रसमलाई का आनंद भी ले रहा था उनकी बातें भी सुन रहा था वो बहुत ही प्यार से रसमलाई और कलाकंद बनाने की विधि बता रही थी। कलाकंद भी अच्छी बनी हुई थी। एक पीस उसका भी खाया।
फिर गुरमुख जी अपने हाथों से चार कप ग्रीन टी लेमन फ्लेवर में बना कर लाये। मैने कहा गुरमुख जी भी बना लेते है तो आंटी जी ने मुस्करा कर कहा वैसे कर लेते है लेकिन आज मेरे चोट लगी है तो कर भी रहे है। चाय आ चुकी थी। चाय भी गजब थी। दोनो दम्पत्ति बाते कर रहे थे प्रसन्न थे हमारे आने पर । अब सात बज चुके थे। आफिस से फोन भी आने लगे थे पर न उनका दिल भरा था न हमारा ।
थोड़ी सी नमकीन भी चखकर आंटी और उनमें अपने माता पिता का स्वरूप देखता हुआ उन्हें प्रणाम कर मैं भावों में डूबा वहां से चल पड़ा। मेरी माता भी कुछ मीठा बनाती थी तो वो भी मेरे लिये अलग से रखती थी कि मंनोज को ये अच्छी लगती है।
मंनोज शर्मा "मन"
sunder story
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